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बस्ती में ठगी का ‘हाइटेक’ तमाशा: बिना देखे, बिना मिले, 20 लाख का चूना!

'टाइप बाबू' का 'डिजिटल' मोह: वाट्सएप के 'जादू' में बह गए 20 लाख!

​अजीत मिश्रा (खोजी)

‘डिजिटल युग’ में ‘टाइप बाबू’ का ‘डिजिटल चूना’: साख से बड़ा लालच?

ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती (उत्तर प्रदेश)

  • सरकारी बाबू का ‘ऑनलाइन’ कमाल: ठगों की तिजोरी भरी, खुद हुए कंगाल!
  • ‘लालच’ की लत, ‘टाइप बाबू’ को पड़ा भारी, 20 लाख की हुई ऑनलाइन ‘आहुति’
  • अदृश्य ठगों से ‘टाइप बाबू’ की प्रेम कहानी, वाट्सएप पर लुटा दी कमाई पुरानी!
  • सावधान! ‘टाइप बाबू’ की तरह न करें ‘टाइपिंग’, वरना खाली हो जाएगी आपकी भी सेविंग्स!
  • ठगों के जाल में फंसा ‘सिस्टम’: क्या आपको भी आ रहा है ‘मुनाफे’ वाला वाट्सएप?

​कहते हैं कि समय के साथ सब कुछ बदलता है, लेकिन ‘ठगने और ठगे जाने’ का सिलसिला शायद इंसानी फितरत का वह सॉफ्टवेयर है, जिसे आज तक कोई ‘अपडेट’ नहीं कर पाया। ताजा मामला बस्ती का है, जहाँ एक ‘टाइप बाबू’ ने खुद को ‘टाइप’ होने से तो बचा लिया, लेकिन अपनी मेहनत की कमाई को ‘डिजिटल ठगों’ के हाथों ‘वाट्सएप’ कर दिया।

ठगी का नया ‘वर्जन’: बिना देखे, बिना मिले, सीधे 20.25 लाख का ‘सफाया’

​जरा सोचिए, व्यक्ति ने जिसे न कभी देखा, न जिसके साथ बैठकर चाय पी, सिर्फ एक वाट्सएप कॉल या मैसेज के झांसे में आकर अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी 20.25 लाख रुपये ऑनलाइन ट्रेडिंग के ‘मायाजाल’ में झोंक दी। जिस ‘टाइप बाबू’ का काम फाइलों को दुरुस्त करना है, उसने अपने ही बैंक बैलेंस की फाइल को ऐसा ‘करप्ट’ किया कि अब साइबर थाने में एफआईआर का ‘पेंडिंग स्टेटस’ ही सहारा है।

क्या ‘अक्ल’ भी अब साइबर अटैक का शिकार है?

​मीडिया और प्रशासन गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला रहे हैं कि किसी अनजान के बहकावे में न आएं, ‘लालच’ का बटन न दबाएं। मगर हमारे ‘टाइप बाबू’ साहिब ने तो जैसे ठान लिया था कि, “पैसे कमाऊं या न कमाऊं, लेकिन ठगों को अमीर जरूर बनाऊंगा!” यह केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि समाज के उस खोखलेपन का आईना है, जहाँ लोग रातों-रात अमीर बनने की शॉर्टकट वाली ‘शॉर्ट सर्किट’ में फंसकर अपना सब कुछ गंवा रहे हैं।

ठग भी खुश, ठगने वाले भी ‘स्वस्थ’

​अजीब विडंबना है! एक तरफ ठग हैं जो बिना किसी डर के लग्जरी लाइफ जी रहे हैं, और दूसरी तरफ हमारे पढ़े-लिखे सरकारी कर्मचारी हैं जो वाट्सएप की ‘मीठी बातों’ में आकर अपनी पूरी कमाई ‘दान’ कर रहे हैं। इन ठगों का हौसला इसलिए भी बुलंद है क्योंकि उन्हें पता है कि ‘लालच’ का शिकार होने वाला व्यक्ति अक्सर पुलिस के पास जाने से भी कतराता है।

सीख या तमाशा?

​यह घटना केवल एक एफआईआर नहीं, बल्कि उन सभी के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है जो घर बैठे ‘इन्वेस्टमेंट’ के चक्कर में अपनी मेहनत की कमाई को ऑनलाइन जुए की तरह उड़ा रहे हैं। बस्ती के ‘टाइप बाबू’ का यह ‘चूना’ न केवल उनके बैंक खाते के लिए, बल्कि उनके विवेक के लिए भी एक बड़ा सबक है।

​अंधाधुंध लालच का यह खेल कब थमेगा, यह कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तय है कि अगर हम अपनी जागरूकता का ‘पासवर्ड’ बदल नहीं सकते, तो ठगी का ‘हैकिंग’ होना तो तय ही है।

चेतावनी: अगली बार वाट्सएप पर कोई ‘मुनाफे का ऑफर’ आए, तो याद रखिएगा—’टाइप बाबू’ ने 20.25 लाख का क्या किया था!

​क्या आपको लगता है कि प्रशासन को इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए केवल जागरूकता अभियानों से आगे बढ़कर और सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है?

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